Friday, September 3, 2021

गढ़वाल में यातायात


         उन्नीसवीं सदी तक गढ़वाल क्षेत्र बेहद बीहड़ व अगम्य था। यहाँ के यातायात की शुरुआत पगडंडियों से हुई। धार्मिक ग्रंथों विशेषकर महाभारत में बदरीनाथ, भृगुपंथ (केदारनाथ), गंगोत्तरी, यमनोत्तरी की तीर्थ यात्रा का वर्णन है। उन्नीसवीं तथा बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में भी अंग्रेज लेखकों- ट्रेल, ब्रेकेट, फ्रेजर, पौ, एटकिंसन, ओकले, वाल्टन आदि ने यहाँ की आकाश छूती ऊँची-ऊँची चोटियों व गहरी धंसती घाटियों में पग-पग पर जोखिम भरे रास्तों का वर्णन किया है। गढ़वाल में सड़क निर्माण का कार्य अंग्रेजी शासन से ही शुरू हुआ। 

        कुमाऊँ (गढ़वाल सहित) के कमिश्नर ट्रेल के समय सन् 1827-28 में हरिद्वार से बदरीनाथ व केदारनाथ जाने वाले पैदल मार्ग का पुनर्निर्माण करवाया गया जो कि लगभग आठ वर्षों में पूर्ण हुआ। सन् 1830 में ट्रेल  ने पिंडारी के दर्रे से तिब्बत तक का रास्ता ढूँढ़ा था जिसे आज भी ‘ट्रेलपास’ के नाम से जाना जाता है।

        बस यातायात गढ़वाल में बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध से ही शुरू हुआ। सन् 1910 में कोटद्वार-फतेहपुर वाली सड़क को लैंसडाउन तक बनवाया गया। ब्रिटिश गढ़वाल में सन् 1839 में जनांदोलन के पश्चात् जिला परिषद द्वारा गुमखाल होते हुए पौड़ी तक सड़क बनवाई गई। टिहरी रियासत में टिहरी नरेश नरेन्द्रशाह के समय सन् 1921 में ऋषिकेश से नरेन्द्रनगर तक तथा सन् 1937-38 में ऋषिकेश-कीर्तिनगर मोटर सड़क बनवाई गई।  वर्ष 1940 तक टिहरी रियासत में लगभग डेढ़ सौ किमी मोटर सड़क का निर्माण पूर्ण हो गया था। दिसम्बर 1946 ई० में मोटर मार्ग चमोली तक पहुँचा तथा मार्च 1947 में नियमित रूप से बसें कर्णप्रयाग तक पहुँचने लगी थीं।  

         गढ़वाल में मोटर मार्गों का विस्तार सन् 1962 में भारत-चीन आक्रमण के पश्चात् द्रुतगति से होने लगा। इससे पूर्व स्वतंत्रता के बाद पाँच वर्षाें में मात्र 16 किमी सड़क पीपलकोटी तक बनी थी। यहाँ मुख्य नदियों के समानांतर ही मुख्य-मुख्य सड़कें ऋषिकेश-माणा अलकनंदा के, रुद्रप्रयाग से गौरीकुण्ड मंदाकिनी के, कर्णप्रयाग से थराली-देवाल पिंडर के, जोशीमठ-मलारी धौली के, डाक पत्थर से यमनोत्तरी यमुना के, टिहरी से गंगोत्तरी तक भागीरथी के, टिहरी से घुत्तू भिलंगना के, डाकपत्थर-त्यूणी-मोरी-नैटवाड़ टोंस के समानांतर बनाई गई हैं। गढ़वाल में राष्ट्रीय राजमार्ग इस प्रकार हैंः-

 राष्ट्रीय राजमार्ग    राजमार्ग का नाम                 लंबाई किमी  

58      मंगलौर-हरिद्वार-बद्रीनाथ-माणा            376

72      ढालीपुर-हरिद्वार                                    93

84      ऋषिकेश-टिहरी-धरासू-यमुनोत्तरी          217

108     धरासू-उत्तरकाशी-गंगोत्तरी                   124

 109     रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड                               76

 119     कोटद्वार-श्रीनगर                                155

 123     हरबर्टपुर-डामटा-नौगाँव-बड़कोट           95

लोक निर्माण विभाग

प्रादेशिक राज मार्ग -  680 कि०मी०

मुख्य जिला सड़क -  672 कि०मी०

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना - 5856 कि०मी०

कुल - 7208 कि०मी०

             गढ़वाल में स्वतंत्रता के बाद रेल यातायात की प्रगति शून्य रही है। सन् 1871 में देहरादून, 1897 में कोटद्वार, तथा 1930 में ऋषिकेश तक रेलवे लाइन बिछाई गई थी। सन् 1919 में गढ़वाल के डिप्टी कमिश्नर जे० एम० क्ले ने ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक रेलवे लाइन बिछाने का सर्वे करवाया था। लगभग सौ वर्ष बाद ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक कुल 125 किमी रेल लाइन का कार्य प्रारम्भ हुआ है। 16200 करोड़ लागत से बन रही इस सिंगल ट्रेक लाइन में 35 पुल तथा 85 प्रतिशत भाग सुरंग से गुजरेगा जिसमें 12 स्टेशन होंगे। 

           चार धाम परियोजना के लिए केन्द्र सरकार द्वारा सड़काें के चौड़ीकरण के लिए 12 हजार करोड़ स्वीकृत किया गया है, जिसका कार्य अपने अंतिम चरण में है। वायु मार्ग के लिए एकमात्र हवाई पट्टी जौलीग्रांट देहरादून में है। गौचर (चमोली) तथा चिन्यालीसौड़ (उत्तरकाशी) में भी पट्टी का निर्माण कार्य हुआ है लेकिन अभी तक कोई हवाई सेवा शुरू नहीं हुई। 

                   -रमाकान्त बेंजवाल

Tuesday, August 24, 2021

गढ़वाल में गंगा


       पावन सलिला गंगा का महात्म्य ऋग्वेद (10ः75ः5) एवं (6ः54ःः37) में आता है। शतपथ ब्राह्मण (31ः5ः4ःः11), जैमिनीय ब्राह्मण (3ः183), तैत्तिरीय आरण्यक (2ः10) तथा रामायण में दर्जनों बार और पुराणों में तो गंगा ही गंगा है। महाभारत में गंगा को देवी के रूप में माना गया है। गंगा भारत की सर्वाधिक महत्वपूर्ण नदी है। इसकी कुल लम्बाई 2525 किमी है, जिसमें 2071 किमी भारत में तथा शेष बंग्लादेश में बहती है। गंगा उत्तराखण्ड में 110 किमी, उत्तर प्रदेश में 1450 किमी, बिहार में 445 किमी तथा पश्चिम बंगाल में 520 किमी की दूरी तय करते हुए बंगाल की खाड़ी में मिलती है। गंगा ने अपनी सहायक नदियों के साथ 10 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल के विशाल उपजाऊ मैदान की रचना की है। गंगा की मुख्य शाखा भागीरथी का उद्गम गंगोत्तरी (3140 मी.) से 19 किमी उत्तर की ओर 3892 मीटर की ऊँचाई पर स्थित हिमनद का मुख है, जिसे गोमुख नाम से जाना जाता है। यह हिमनद 25 किमी लम्बा और चार किमी चौड़ा है।

             गढ़वाल में गंगा की मुख्य नदी भागीरथी पर टिहरी में विश्व का सबसे ऊँचा बांध बना है। इस बांध की ऊँचाई 261 मीटर है। इससे 2400 मेगावाट विद्युत उत्पादन होता है। इससे पूर्व सिंचाई के लिए हरिद्वार में अंग्रेजों द्वारा सन् 1840 में गंगा पर एक बांध गंगा के पानी को विभाजित कर ऊपरी गंगा नहर में मोड़ने के लिए बनाया गया था। विशिष्ट पर्वों पर पवित्र गंगा में स्नान का विशेष महत्व है। पवित्र गंगा जल को लोग अपने घरों में रखते हैं। मृत्यु के उपरान्त राख विसर्जित करने और पिण्डदान हेतु भी गंगा सनातन धर्मावलम्बियों के लिए अपनी आस्था और विश्वास का प्रतीक है। इसका महत्व पर्यटन पर आधारित आय के कारण भी है। इसके अतिरिक्त पेयजल, कृषि, पर्यटन तथा साहसिक खेलों में गंगा का विशिष्ट महत्व सर्वविदित है।  

                ये गंगा का महात्म्य ही है कि गढ़वाल में गंगा की सहायक नदियों को ‘गंगाळ’ कहा जाता है। अलकनंदा की प्रमुख शाखा धौली ने विष्णुगंगा से मिलकर ‘विष्णुप्रयाग’ नंदाकिनी से मिलकर ‘नंदप्रयाग’ पिंडर के संगम पर ‘कर्णप्रयाग’ मंदाकिनी से मिलती हुई ‘रुद्रप्रयाग’ तथा भागीरथी के संगम पर ‘देवप्रयाग’ जैसे ‘पंचप्रयागों’ का निर्माण कर इस क्षेत्र को पुण्य भूमि बनाया है। इन पवित्र नदियों से ही गंगा का निर्माण हुआ है। ‘गंगा संस्कृति’ ही आदि हिंदू संस्कृति मानी जाती है। यहाँ गंगा शब्द कभी-कभी जातिवाचक संज्ञा की तरह भी प्रयुक्त होता है। नन्दा के जागरों में एक जगह वर्णन हैः-

         नौ धारों की गंगा ह्वोलि, आड़ू नेड़ू ऐगो अब

         पंचधारा गंगा माता, होमकुण्डी की जात हुनी।

           इसका तात्पर्य है जल की नौ धाराएँ बहती हैं, पंचधारा नजदीक आने को है और होमकुण्ड में जात सम्पन्न होने को है। यहाँ गंगा जलधाराओं के लिए कहा गया है। जो आगे जाकर नंदाकिनी में मिलती है। गढ़वाल का नाम ‘गंगावाल’ होना चाहिए था। गढ़वाल गंगा का उद्गम है, उसका उत्स है, उसका मायका है, यह गढ़वाल की धियाण है, उसकी आस्था है और उसका विश्वास है। गंगा पर गढ़वाली भाषा में कई गीत रचे गए हैं। जिनमें उत्तराखण्ड के गौरव प्रख्यात गीतकार/गायक नरेन्द्र सिंह नेगी जी द्वारा रचित एक गीत बहुत प्रसिद्ध हैः-

       गंदळु करियाली तेरु छाळु पाणी गंगा जी

       माँ का दूधै लाज बि नि राखि जाणी गंगा जी

       इस गीत में नेगी जी ने गंगा के उस निर्मल जल के प्रदूषित होने का दर्द बयाँ किया है जिसके निवारण के लिए ‘नमामि गंगा’ और ‘स्पर्श गंगा’ जैसे अभियान चलाए गए हैं। इस लोक में गंगा का एक और पहलू है जिसका वर्णन गढ़वाली के ही कवि महेश तिवाड़ी जी ने इस तरह किया हैः-

      औरों तैं बगै होला, तिन अमरित का धारा

      हमारा भाग परै अयां, तेरा ढुंगा-गारा

       यह भी एक सच्चाई है कि गंगा तथा इसकी सहायक नदियाँ पानी और उपजाऊ मिट्टी बहाकर ले जाती है और पीछे छूट जाते हैं पत्थर यानी ‘गंगलोड़े’। बावजूद इसके गंगा हमारे लिए ‘धियाण’ है। वह हमारे स्वभाव में है। हमारे लिए पूज्य है। स्तुत्य है। बोली भाषा में है। हम कामना करते हैं कि इसका जल निर्मल रहे। इसी कामना को व्यक्त करती बीना बेंजवाल जी की गंगा पर लिखी पंक्तियाँ इस प्रकार हैंः-

       हिमवंत मैत तेरो गंगा तु हमारि धियाण

       सागर तलक बढ़ौंदि जांदि तु हिमालै कु मान

       माटा पाणी मैत बिटि तु ल्हिजै समौण

       हरु-भरु चैपस बसौंदि गंगा कु मैदान।

         इन पंक्तियों में हिमालय गंगा का मायका है। गंगा ही है जो वानस्पतिक वैभव सम्पन्न हिमवंत प्रदेश की जड़ी-बूटियों से अमृत तुल्य बनी जलराशि लिए गंगा सागर तक हिमालय का मान-सम्मान बढ़ाती जाती है। यहाँ की स्मृति को संजोए रखने के लिए यहाँ से मिट्टी और पानी बहाकर गंगा के मैदान का निर्माण करती है।

        गंगा की महत्ता को देखते हुए 4 नवम्बर, 2008 को इसे राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया। गंगा की सफाई के लिए कई बार पहल की गई। जुलाई 2014 में ‘नमामि गंगा’ नामक परियोजना प्रारम्भ हुई तथा इसके लिए भारत सरकार द्वारा अलग से बजट का प्रावधान किया गया है। इस योजना के अंतर्गत सरकार ने गंगा में कचरा निस्तारित करने वाली 48 औद्योगिक इकाइयों को बंद करने का आदेश दिया। आज लगभग 29 शहर, 70 कस्बे, और हजारों गाँव गंगा तट पर बसे हैं।


             (साभार- गढ़वाल हिमालय- रमाकान्त बेंजवाल)

Thursday, August 19, 2021

गढ़वाल नाम तथा गढ़वाल के गढ़

 गढ़वाल नाम और गढ़वाल के गढ़

         गढ़वाल नाम से पूर्व इस भूभाग का नाम केदारखण्ड था। माना जाता है कि 16वीं सदी के प्रारम्भ में राजा अजयपाल ने छोटे-छोटे गढ़ों का एकीकरण किया था। गढ़ों के कारण इस प्रदेश का नाम 'गढ़वाल' पड़ा। (गढ़वाल का इतिहास- पं० हरिकृष्ण रतूड़ी, पृ० 2) रायबहादुर पातीराम के अनुसार 'गढ़पाल' से इस क्षेत्र का नाम 'गढ़वाल' पड़ा। "We observe that in the Preforming 'sankalpa' this country is called by some of the priests Garh Pal desha instead of Garhwal, which makes us sunrise that the modern name has been given to this land by one of the Rajas of the dynasty of Kanakpal, and most Probably by Raja Ajaypal on his establishing a firm domain in Garhwal. Judging form the nature of the country, the Raja gave it the name of Garh, adding the word Pal as his family suffix."  (Garhwal Ancient and Modern-day Patiram, page 13)


       हरिदत्त भट्ट शैलेश यहां बह रही छोटी-बड़ी नदी को 'गाड' प्रयुक्त होने से गाड वाला क्षेत्र 'गाडवाला' की उत्पत्ति बताते हैं।  (गढ़सुधा- 84-85, चण्डीगढ़, पृ० 1) मानशाह (1591-1611 ई०) के सभा कवि भरत के 'मानोदय काव्य' में 'गढ़देश' नाम का प्रयोग किया है तथा अभिलेखीय साक्ष्यों में  हाट गाँव से प्राप्त 1640 ई० के फतेशाह के ताम्रपत्र में 'गढ़वाल संतान' शब्द मिलता है।  (उत्तराखंड के वीर भड़- डाॅ० रणवीर सिंह चौहान, पृ० 3) 15वीं सदी से पूर्व किसी राजा (गढ़ाधिपति) की राजधानी को 'गढ़' ही कहा जाता था। गाडवाला से 'ग' में 'आ' की मात्रा विलुप्त नहीं हो सकती है। 'गढ़पाल' शब्द कहीं तंत्र-मंत्रों के अलावा कहीं प्रयुक्त नहीं हुआ है। प्राचीन समय में यहां बस रही जातियाँ अपने गाँव या गढ़ के नाम पर 'वाल' लगाकर अपनी उपजातियाँ रखती थीं। निश्चय ही इसी तरह गढ़ों के क्षेत्र 'गढ़' के साथ 'वाल' लगाकर 'गढ़वाल' शब्द की उत्पत्ति हुई।


     माना जाता है कि अजयपाल ने 52 प्रमुख गढ़ों पर विजय प्राप्त कर अपने राज्य का विस्तार किया था। पं० हरिकृष्ण रतूड़ी 52 गढ़ों का उल्लेख करते हुए इनकी संख्या अधिक भी बताते हैं। 52 का अंक शुभ माने जाने तथा 52 गढ़ों की सूची सर्वप्रथम प्रकाशित होने से 52 गढ़ ही सर्व प्रचलित हैं। डाॅ० यशवन्त सिंह कठोच ने कांसुवा (चाँदपुर)  तथा जाख (ग्यारह गाँव)  से प्राप्त संवत् 1932 की हस्तलिखित गढ़ सूची मूल रूप में प्रकाशित की है। इसमें 52 गढ़ों का जिक्र करते हुए 54 गढ़ों की सूची दी गई है। (मध्य हिमालय-1, कठोच, पृ० 126)


    डाॅ० रणवीर सिंह चौहान के अनुसार 52 नरसिंह गढ़ थे। इनके अलावा 85 भैरव गढ़, कई मांडलिक गढ़, नाग गढ़ी, राजपूत गढ़ियाँ थीं। अजयपाल ने 52 गढ़ों का एकीकरण किया था, वे गढ़ नरसिंह देव (कत्यूरी राजा) के स्थापित 52 गढ़ ही थे। इन 52 गढ़ों की संख्या नरसिंह देव के जागरों से ज्ञात होती है। (सफरनामा पौड़ी- रणवीर सिंह चौहान, पृ० 30)


बावन गढ़ और गढ़पति की जाति:-

अजमेर- पयाल,  इडिया- इडिया,  उपु- चौहान,  एरासू, कंडारा- कंडारी, काण्डा- रावत, कुइली- सजवाण, कुजेगी- सजवाण, कोल्ली- बिष्ट, गड़तांग- भोट,  गढ़कोट- बगडवाल बिष्ट,  गजड़ू-, चम्पा-,  चाँदपुर- सूर्यवंशी,  चौण्डा- चौंडाल, चौंदकोट-, जौट-,  जौलपुर-, ढांगू-,  तोप- तोपाल, दशोली-,  देवल-,  धौना- धौन्याल, नापुर- नागवंशी, नयाल- नयाल, नाला-,  फल्याण- फल्याण, बदलपुर-, बधाण- बधाणी, बनगढ़-, बागगढ़- बागूड़ी नेगी, बागर- नागवंशी राणा, बिराल्टा- रावत, भरदार-, भरपूर- सजवाण, भुवनागढ़-,  मुंगरा गढ़-रावत, मौल्या- रमोला, रतनगढ़- धमदा, रवाड़- खाड़ी, राणी गढ़- खाती, रामी गढ़- राणा, रैका गढ़- रमोला,  लंगूर गढ़, लोद गढ़, लोदना गढ़, लोहबा गढ़- लोहबा नेगी, श्रीगुरु गढ़- पडियार, संगेला गढ़- संगेला बिष्ट, सांकरी गढ़- राणा,  सावली गढ़-,  सिलगढ़- सजवाण। (जिन गढ़ों के आगे जाति नहीं है उनके गढ़ाधिपति की जाति अज्ञात है)


    गढ़ किसी ऊँचे टीले पर बना होता था।  प्रायः गढ़ पर चढ़ने के लिए एक ही मार्ग रखा जाता था जिससे दुश्मनों के आक्रमण का मुकाबला किया जा सके। गढ़ के चारों ओर ऊँची दीवार बनी होती थी। गढ़ में स्थानीय वास्तु शिल्प से गढ़ाधिपति का भवन बना होता था। शक्तिशाली गढ़ से जमीन के अंदर सुरंग बनी होती थी। यह सुरंग किसी पानी के स्रोत या नदी तक जाती थी। यह सुरंग शत्रु के अचानक गढ़ पर हमला किए जाने पर गुप्त मार्ग के रूप में प्रयोग की जाती थी। गढ़ की स्थापना की बुनियाद में मानव बलि दी जाती थी। अजयपाल ने भी अपने प्रासाद की नींव पर एक दासी की बलि दी थी। (उत्तराखंड के वीर भड़- डाॅ० रणवीर सिंह चौहान, पृ० 12) गढ़वाल के प्राचीन गढ़ों के ध्वंसावशेष मिट्टी-पत्थरों के ढेर में तब्दील हो गये हैं। इनका न ही संरक्षण किया जा रहा है और न ही उत्खनन की ओर पुरातत्व विभाग का ध्यान गया है। ज्ञात ऐतिहसिक गढ़ों का उत्खनन किया जाए तो चाँदपुर गढ़ी की भांति ऐतिहासिक सामग्री मिल सकती है। 

(गढ़वाल हिमालय- रमाकान्त बेंजवाल से साभार)

Monday, August 16, 2021

शब्दकोश, थिसारस (समांतर कोश) तथा ज्ञानकोश में अंतर

 शब्दकोश, थिसारस तथा ज्ञानकोश देखने की विधि और इनमें अंतर

             आप कुछ पढ़ रहे हैं और कोई नया शब्द आपने पढ़ा जिसका अर्थ आपको पता नहीं है तो आप अपने पास उपलब्ध शब्दकोश में उसका अर्थ देखकर लिखे हुए को समझ सकते हैं। शब्दकोश की सहायता से आप किसी भी शब्द का अर्थ जान सकते हैं। लेकिन यदि आप कुछ लिख रहे हैं और अपने विचार को अभिव्यक्त करने के लिए किसी सटीक शब्द की तलाश में हैं तो शब्दकोश आपकी मदद नहीं कर पाएगा। ऐसे में आपको थिसारस की शरण में जाना होगा। थिसारस के लिए शब्द विज्ञानी अरविंद कुमार जी ने हिंदी में ‘समांतर कोश’ नाम दिया है।

                समांतर कोश शब्दकोश के ही समान संदर्भ पुस्तक को कहा जाता है जिसमें शब्दों के अर्थ व उच्चारण के बजाय उसके समानार्थक तथा विलोम शब्दों व उनके प्रयोग पर जोर दिया जाता है। शब्दकोश की भांति समांतर कोश में शब्दों को परिभाषित नहीं किया जाता है बल्कि समान शब्दों में भेद स्पष्ट कर सटीक शब्द के चुनाव को आसान बनाया जाना इसका ध्येय होता है। इस प्रकार समांतर कोश को शब्दसूची नहीं समझा जाना चाहिए।

                 हिंदी का पहला समांतर कोश बनाने का श्रेय अरविंद कुमार जी एवं उनकी पत्नी कुसुम कुमार जी को दिया जाता है। इसके दो खण्ड हैं। पहला ‘अनुक्रम खण्ड’ और दूसरा ‘संदर्भ खण्ड’। अनुक्रम खण्ड में आपको शब्दकोश की भांति वर्णानुक्रम में अपना अभीष्ट शब्द देखना होगा तथा उस शब्द के समांतर अन्य शब्द का क्रमांक इसी पहले खण्ड में मिलेगा। उदाहरण के लिए आप कोई कविता या कहानी लिख रहे हैं। आपको कहीं पर ‘ओखा’ शब्द लिखना पड़ रहा है। लेकिन आप इस शब्द से संतुष्ट नहीं हैं और इसकी जगह कोई अन्य समानार्थी शब्द चाहते हैं। तब आप पहले अनुक्रम खण्ड में देखेंगे। इसमें यह ‘ओखा/ओखी’ लिखा मिलेगा। इसके ठीक नीचे -छिद्रिल- 291.31 लिखा होगा। यदि आपका काम ‘छिद्रिल’ से चल जाता है तो यहीं आपकी समस्या का समाधान हो गया। लेकिन आप ‘छिद्रिल’ से भी संतुष्ट नहीं हैं तो फिर आप समांतर कोश के ‘संदर्भ खण्ड’ को खोलेंगे। ‘संदर्भ खण्ड’ संख्या क्रम में है। 

             अब आप संख्या क्रम 291.31 में देखेंगे। इसमें ‘छिद्रिल’ मूल प्रविष्टि दिखेगी।

             इसके आगे- ओखा/ओखी, खखरा/खखरी, खाँखर, छलनीदार, छिदरा/छिदरी, छिदा/छिदी, छिद्रयुक्त, छेदित, छेदीला/छेदीली, जजंरीक, जालीदार, झंझरा, झंझरीदार, झनैना/झनैनी, झांझर, झिरझिरी, झिलमिल, झिल्लड़, झीना/झीनी, धोतर, रंध्रिल, रंध्री, रिसता/रिसती, शुषिर, सुराखदार, स्रावशील, स्रावी आदि हैं। अब आपको मन वांछित पर्यायवाची जो भी ठीक लगे, उसे लिख सकते हैं। इस प्रकार क्रमांक से संदर्भ खण्ड में वांछित शब्द के समांतर शब्दों को देखा जाता है। अरविंद कुमार जी लिखते हैं कि शिव के ही 2,519 पर्याय शब्द इसमें दिए गए हैं। समांतर कोश में 988 शीर्षक हैं तथा 25,562 उपशीर्षकों के 2,90,477 अभिव्यक्तियाँ दी गई हैं।

               इस प्रकार एक शब्द के समान अर्थ वाले शब्दों को थिसारस (समांतर कोश) में समाहित किया जाता है। जैसे- मीठा स्वाद सं- गुड़ जैसा स्वाद, चीनी जैसा स्वाद, मधु जैसा स्वाद, मधुराई, मधुरिमा, माधुरी, माधुर्य, मिठास, मीठापन, रसालता, सरसता, ॰ईख रस ॰केरेमल ॰खौड़ ॰गुड़ ॰चाशनी ॰चीनी ॰बूरा ॰मिसरी ॰शक्कर ॰शर्वफरा ॰शहद ॰शीरा ॰स्वीटनर आदि। थिसारस हिंदी भाषा में नब्बे के दशक में सामने आया है। इस प्रकार के काम क्षेत्रीय भाषाओं में भी हो सकते हैं।

        शब्दकोश और ज्ञानकोश में अंतर

              जिस प्रकार ‘शब्दकोश’ में शब्दों के अर्थ दिए होते हैं उसी प्रकार ‘ज्ञानकोश’ में मानव द्वारा संचित ज्ञान को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया जाता है। हालांकि शब्दकोश भी एक ज्ञानकोश ही होता है। शब्दकोश में किसी शब्द का सूक्ष्म अर्थ दिया होता है लेकिन ज्ञानकोश ऐसा ग्रंथ होता है जिसमें जानकारी या विमर्श के लिए कुछ विशिष्ट प्रसंगों की बातें देखी जाती हैं। ज्ञानकोश कई प्रकार के होते हैं। ज्ञानकोश का सबसे विशद रूप ‘विश्व ज्ञानकोश’ है। इसमें मानव द्वारा संचित हर प्रकार की जानकारी और सूचना का संक्षिप्त संकलन होता है।

              हम ज्ञानकोश को संदर्भ ग्रंथ भी बोल सकते हैं। संदर्भ ग्रंथों के अन्य महत्वपूर्ण प्रकार ‘साहित्य कोश’ और ‘चरित कोश’ होते हैं। ‘साहित्य कोश’ में साहित्यिक विषयों से सम्बन्धित जानकारियाँ संकलित होती हैं। ‘चरित कोश’ में साहित्य, संस्कृति, विज्ञान, खेल, अर्थशास्त्र, राजनीति आदि क्षेत्रों के महान व्यक्तियों के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में जानकारी संकलित होती है।

            ज्ञानकोश गागर में सागर समान होते हैं। जब भी किसी विषय पर तुरंत जानकारी की आवश्यकता होती है, संदर्भ ग्रंथ या ज्ञानकोश हमारे काम आते हैं। ज्ञानकोशों में जानकारियों का सिलसिलेवार संकलन ‘शब्दकोश’ के नियमों के अनुसार ही होता है। आज के समय में सबसे बड़ा ज्ञानकोश ‘गूगल सर्च इंजन’ है। हालांकि इन सूचनाओं को प्रामाणिक मानने में अपने विवेक का इस्तेमाल करना पड़ता है। विकिपीडिया गूगल में सबसे बड़े ज्ञानकोशों में एक है। सर्व प्रथम विकिपीडिया अंग्रेजी में जनवरी, 2001 में आरंभ हुआ। हिंदी में विकिपीडिया जुलाई, 2003 से शुरू हुआ। इसमें दुनिया की लगभग 309 भाषाओं में सूचनाएँ संकलित हैं। इनका स्रोत कोई भी हो सकता है। प्रयोक्ता इसमें अपनी सूचनाओं को अपडेट कर सकता है। यह एक मुक्त ज्ञानकोश है।

                                -रमाकान्त बेंजवाल

Sunday, August 15, 2021

गढ़वाली गंध बोधक शबदावली

गढ़वाली में गंध बोधक शब्दावली गंध के विभिन्न प्रकारों के लिए गढ़वाली में अनूठी शब्दावली है। ये शब्द संपदा गढ़वाली की अपनी महत्वपूर्ण निधि है। अमलाण- (अम्लीय गंध) उगळाण- (काँसा या पीतल के बर्तन में रखी खट्टी वस्तु से आने वाली गंध) कचाण- (कच्चे या अधपके खाने से आने वाली गंध) किकराण- (ऊनी वस्त्र जलने की गंध) किड़ाण- (बालों के जलने या बाघ की प्रजाति से आने वाली दुर्गंध) कुकराण- (कुत्तों के शरीर से आने वाली दुर्गंध) कुतराण- (सूती कपड़े जलने की गंध) कुमराण- (ताजा घी बनाने की गंध) कुल्ढाण- (गंदे कपड़ों की गंध) कौंखाण- (अनाज से आने वाली गंध) खटाण- (छाँछ या दही से आने वाली खट्टेपन की गंध) खिकराण- (मिर्च या कोई तीखी चीज जलने की गंध) खुड़क्याण- (छौंक की गंध) खुमसाण- (पुराने अनाज से आने वाली गंध) खौंकाण- (सड़े या बहुत दिनों तक सीलन में रखे अनाज से आने वाली गंध) गुवाण- (मल से आने वाली गंध) गौंताण- (गो मूत्र से आने वाली गंध) घियाण- (घी की गंध) चिलखाण- (कच्चे तेल की गंध, मांस भुनने की गंध) चुराण- (पेशाब की गंध) चौंळाण- (चावलों के पानी से आने वाली गंध) छौंकाण- (छौंक की गंध) जराण- (ज्वर के कारण शरीर से आने वाली गंध) टौंकाण- (बदबू, दुर्गंध) ढेबराण- (भेड़ों पर आने वाली गंध) तमळाण- (ताँबे के बर्तन में रखी वस्तु से आने वाली गंध) तेलांण- (किसी तली हुई चीज पर आने वाली कच्चे तेल की गंध) त्वमाण- (लौंकी की प्रजाति 'त्वमड़ी' की गंध) दुधाण- (दूध की गंध) दौंदाण- (भिगाई हुई दाल को पीसकर बनाए गए अधपके साग पर आने वाली गंध) धुवांण- (धुएँ की गंध) पदाण- (अधोवायु की गंध) पितळाण- (पीतल के बर्तन में रखी खट्टी वस्तु से आने वाली गंध) पिपराण/पिराण- (प्याज, मिर्च या सरसों के तेल आदि से आने वाली तीखी गंध) फुक्याण- (जलने की गंध) बखराण- (बकरियों पर आने वाली गंध) बस्याण- (बासी भोजन की गंध) ब्वखलाण/लुराण- (छोटे बच्चों के शरीर से आने वाली तेल आदि की गंध) भुज्याण- (किसी अनाज को भूनने पर आने वाली गंध) भुटाण- (छौंक की गंध) भुभलाण- (खराब घी की गंध) मछल्याण- (मछली की गंध) मटाण- (मिट्टी की गंध) मुंगाण- (मूंग दाल की गंध) मोळाण- (गोबर की गंध) सड़्याण- (सड़ी हुई वस्तु से आने वाली दुर्गंध) सिलपाण- (सीलन की गंध) हळ्दाण- (हल्दी की गंध) (साभार- हिंदी-गढ़वाली-अंग्रेजी शब्दकोश - रमाकान्त बेंजवाल एवं बीना बेंजवाल। संरक्षण आधार- अरविंद पुरोहित)

गढ़वाली भाषा एवं साहित्य के लेखक और उनका साहित्य



(लेखकों के नाम वर्णानुक्रम में दिए गए हैं) 

अच्युदानन्द घिल्डियाल- गढ़वाली भाषा और साहित्य, राष्ट्रभाषा परिषद, पटना, 1962, पृ. 23

डॉ० अचलानंद जखमोला- उत्तराखण्ड की लोकभाषाएँ, विनसर पब्लिशिंग कंपनी, देहरादून, 2013, पृ. 160; गढ़वाली हिंदी अंग्रेजी शब्दकोश (संपादक) संस्कृति विभाग, उत्तराखण्ड, देहरादून सन् 2014, गढ़वाली भाषा के अनालोचित पक्ष, समय साक्ष्य देहरादून. इंगलिश गढ़वाली हिंदी डिक्शनरी, समय साक्ष्य, देहरादून, 2016,

अतुल मोहन सकलानी- नयां गढ़वलि गीत

अनुसूया प्रसाद डंगवाल- उमाळ (कविता) , वीं रात (कहानी), चिलंगा (नाटक) , उड़दा पंछी (नाटक) , रग्धू (नाटक) 

अनूप रावत- ज्यू त ब्वनू च (कविता) , रावत डिजिटल, गाजियाबाद, 2019,पृ. 96

अबोधबंधु बहुगुणा- भुम्याळ (महाकाव्य) , हिमालय कला संगम, नई दिल्ली, सन् 1977, पृष्ठ 184; घोल (कविता) , जनकपुरी, नई दिल्ली, सन् 1976, पृष्ठ 52; पार्वती (कविता) , गढ़वाली प्रकाशन, नई दिल्ली, सन् 1994, पृष्ठ 180; रण मंडाण, कणखिला (क्षणिकाएं) , गढ़वाली प्रकाशन, नई दिल्ली, सन् 1996, पृष्ठ 54; दैसत (कविता), गढ़वाली प्रकाशन, नई दिल्ली, सन् 1996, पृष्ठ 51; शैलवाणी (संपादक) , हिमालय कला संगम, नई दिल्ली, 1981; अंख पंख (कविता) गढ़़वाल नव चेतना समिति, नई दिल्ली, सन् 1971 पृ०32; तिड़का (दोहे) , गढ़वाल साहित्य मण्डल, सन् 1958, पृष्ठ 127; चक्रचाळ (एकांकी), जनकपुरी, नई दिल्ली, सन् 1986, पृष्ठ 186; भुगत्यूं भविष्य (उपन्यास) गढ़वाली प्रकाशन, नई दिल्ली, 1997, पृ. 347; धुयांळ (लोकगीत), गढ़वाली साहित्य परिषद, देहरादून, सन् 1983, पृष्ठ 82; कथा-कुमुद (कहानी), गढ़वाली प्रकाशन, जनकपुरी, नई दिल्ली, सन् 1999, पृष्ठ 92; गढ़वाली व्याकरण की रूपरेखा, गढ़वाली प्रकाशन, नई दिल्ली, 1960 पृष्ठ 48; माई को लाल- अंतिम गढ़ (नाटक) ; रगड़्वात 2003 (कहानी) ; गाड म्येटिक गंगा (संपादित) अलकनन्दा प्रकाशन, नई दिल्ली, सन् 1976, पृष्ठ 224; एक कौंळि किरण, गढ़वाली प्रकाशन, जनकपुरी, दिल्ली, सन् 2000

अमरनाथ शर्मा- हुँणत्यालि डाळि (काव्य) बद्रीनाथ, सन् 2005, पृष्ठ 132; भागीरथी, प्रेमा शर्मा, लखनऊ, पृ. 32; रामावतार (खण्डकाव्य) , प्रभा शर्मा, लखनऊ, पृ. 36; चिर परित्यक्ता (काव्य) , भागीरथी प्रकाशन, लखनऊ, 2004

अम्बादत्त शर्मा- गढ़वाली कहावत कोश

डॉ० अरविंद कुमार गौड़- गढ़वाली बोली का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन, शोध कार्य, उत्तराखण्ड भाषा संस्थान, देहरादून, 2011, पृ. 288

अरविंद पुरोहित- गढ़वाली हिंदी शब्दकोश (संयुक्त) विनसर पब्लिशिंग कंपनी देहरादून 2007 पृ०520

अरविंद ‘प्रकृति प्रेमी’- प्रकृति अर मनखि (कविता) विनसर पब्लिशिंग कंपनी, देहरादून, 2017, पृ. 72

अश्विनी गौड़- चौमासि हर्याळि (कविता) , संस्कृति प्रकाशन, अगस्त्यमुनि, 2014, पृ. 60

आत्माराम फौंदड़ी ‘कमल’- रुक्मणी गौरव (गाथा काव्य), चौरास विकास एवं जनकल्याण समिति, टिहरी, सन् 1986, पृष्ठ 63.; कलि दर्पण (गीत काव्य), कमल साहित्य सदन, टिहरी, सन् 1988, पृष्ठ 63; श्रीगोविन्द गीत, कमल साहित्य सदन, दिल्ली, 1997, पृ. 71; रैमोड़ी, कमल साहित्य सदन, दिल्ली, 1984, पृ. 32

आदित्यराम दुदपुड़ी- गढ़कथा कुसुम, स्वयं प्रकाशित, 1993, पृ. 112; गढ़गीता स्वयं प्रकाशित, 1991, पृ. 288; गढ़वालि रामैण स्वयं प्रकाशित, सन् 1990, पृष्ठ 64; गढ़वालि महाभारत, स्वयं प्रकाशित, 1990, पृ. 68; गढ़नीति शतक स्वयं प्रकाशित, 1991, पृ. 86; विदुर नीति स्वयं प्रकाशित, 1992, पृ. 192

डॉ० आशा रावत- मैत की खुद (कहानी) , शैलवाणी प्रकाशन, कोटद्वार, 2009, पृ. 107; हमरु गौं होश्यारखाल (नाटक) , खबरसार, पौड़ी, 2010, पृ.99

आशीष सुन्दरियाल- द्वी मिन्टो मौन (कविता) , समय साक्ष्य, देहरादून, 2020, पृ. 96

ईश्वरी दत्त चतुर्वेदी- कलयुगी अबला (1929) 

उदयराम शर्मा- नवीन धर्म शिक्षावली (1930) 

उमा भट्ट- द्वि आखर (कविता) , विनसर पब्लिशिंग कं., देहरादून, सन् 2010, पृष्ठ 80

उमाशंकर सतीस- रैमासी (लोकगीत) संपादक शिवचरण लाल ऋषिकेश, पृ.85; खुदेड़ (संपादक) गीत, 

जुगलकिशोर एण्ड ब्रदर्स, देहरादून, पृ. 48; समौण (कविता) 

उमाशंकर थपलियाल ‘समदर्शी’- भ्यूंचळो (कविता) , श्री ज्वाल्पा निवास, श्रीनगर गढ़वाल, सन् 1992, पृष्ठ 24; गौं किलै उजड़्ना छन (कविता) , श्री कम्यूनिकेशन, श्रीनगर, सन् 2003, पृष्ठ 104; कलमै बात 2013 (कविता) 

उमेश चन्द्र नैथानी- बसुमती (कहानी) सुमन प्रकाशन, पौड़ी, सन् 2006, पृष्ठ 45; नथुलू (कहानी)

डॉ० उमेश चमोला- उमाळ (कविता), विनसर पब्लिशिंग कंपनी, देहरादून, सन् 2006, पृष्ठ 64; पथ्यला (गीत/कविता) , साहित्य पूर्वा, बिजनौर, 2011, पृ. 80; निरबिजु (उपन्यास) , विनसर पब्लिशिंग कंपनी, देहरादून, 2012, पृ. 25; कचाकि (उपन्यास) , अविचल प्रकाशन, बिजनौर, 2014, पृ. 63; पड़्वा बळ्द (व्यंग्य कविता) , अखिल ग्राफिक, बिजनौर, 2015, पृ. 58; बणद्यौ कि चिट्ठी (बाल नाटक), समय साक्ष्य, देहरादून, 2018, पृ. 39; नानतिनों कि सजोळि (बाल कविता, संयुक्त) , आधारशिला, हलद्वानी, 2014, पृ. 62; छै फुटै जमीन (कहानी अनुवाद) आधार प्रकाशन, 2021

उम्मेद सिंह नेगी- डांडी-कांठी

ओंकार सिंह- गढ़वाली गीत (काव्य एकांकी) , स्वयं प्रकाशित, 2004

ओम बधाणी- कुरमुरी (कविता) , विनसर पब्लिशिंग कंपनी, देहरादून, 2013, पृ. 100; रांसा तांदी (संपादन) लोकगीत, विनसर पब्लिशिंग कंपनी, देहरादून, 2020, पृ. 100

ओम प्रकाश चमोला ‘अश्क’- दूर्बा (कहानी) , जय अम्बे पुस्तक भण्डार, अगस्त्यमुनि, 2019, पृ. 96

ओम प्रकाश सेमवाल- कलसुड़ी (भजन गीत) , चिट्ठी प्रकाशन, देहरादून, सन् 2000; मेरि पूफु (कहानी संग्रह), धाद प्रकाशन, देहरादून, सन् 2009, पृष्ठ 132; ढुंगळा (कहानी संग्रह) , संस्कृति प्रकाशन, अगस्त्यमुनि, 2013, पृ. 100; चुनौ (नाटक) संस्कृति प्रकाशन, 2020 पृ. 88

ऋषि कण्डवाल- मेरि अग्याळ (कविता) , हिमाद्रि प्रकाशन, कोटद्वार, पृ. 69

कन्हैयालाल डंडरियाल- अंज्वाळ (कविता) , मौळ्यार प्रकाशन, दिल्ली, द्वितीय संस्करण 2004, पृ. 128; मंगतू गढ़वाल साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, सन् 1960, पृष्ठ 18; कुयेड़ी, (कविता संग्रह) , अरुणोदय प्रकाशन, दिल्ली, सन् 1990, पृष्ठ 79; नागराजा (महाकाव्य) , गढ़वाली साहित्य परिषद, कानपुर, सन् 1993, पृष्ठ 255; रुद्री, चांठों का घ्वीड़ (गद्य) , गढ़वाल अध्ययन प्रतिष्ठान, दिल्ली, सन् 1998, पृष्ठ 74; बागी उपनै लड़ै (खण्डकाव्य ) हिमालय लोक साहित्य, देहरादून, 2021, पृ.96, 

कमल साहित्यालंकार- स्वर मंदाकिनी

कुंज बिहारी मुंडेपी ‘कलजुगी’- ऐना (कविता) , बिन्दी प्रकाशन, गाजियाबाद, 2012, पृ. 88

कुलानंद घनशाला- आस-औलाद (नाटक) गढ़गाथा कला मंच देहरादून, सन् 2001 पृ० 64; मनखि बाघ (नाटक), हिमालय लोक साहित्य एवं संस्कृति विकास ट्रस्ट, देहरादून, 2010, पृ. 88; अब क्य होलु (नाटक) , संस्कृति विभाग, उत्तराखण्ड, देहरादून, 2012, पृ. 92; क्य कन तब (नाटक) , समय साक्ष्य, देहरादून, 2014, पृ. 55; रंगछोळ (नाटक) , समय साक्ष्य, देहरादून, 2019, पृ. 196

कुलानंद भारतीय- डौल्या (कविता) 

केशव दत्त रुवाली- गढ़वाली, साहित्य अकादमी, दिल्ली, 2015, पृ. 204

केशवानंद कैंथोला- चौंफला रामायण, मन तरंग (कविता) 

कैलाश बहुखण्डी ‘जीवन’- गौं कि याद (काव्य), शैलवाणी प्रकाशन, कोटद्वार, 2012, पृ. 94

गंगापुरी गोस्वामी- विश्व भजनमाला

गजेन्द्र नौटियाल- नौ नवाण  (नाटक), विनसर पब्लिशिंग कं., देहरादून, सन् 2005, पृष्ठ 144; आंख्यों मा (कविता)

गजेन्द्र बटोही एवं महेन्द्र ध्यानी- उड़ घुघुती उड़, (कविता) हाइडिल कॉलोनी, बिजनौर, सन् 2005, पृष्ठ 144.

गणेश खुगशाल ‘गणी’- वूं मा बोलि दे (कविता), विनसर पब्लिशिंग कं, देहरादून, 2014, पृ. 116; धगुलि, हंसुळि, छुबकि, पैजबि, झुमकि (कक्षा एक से पांचवीं तक की कक्षाओं की पाठ्य पुस्तकों का संयोजन); धाद मासिक पत्रिका का पिछले पांच वर्षों से नियमित संपादन

गिरिजा दत्त नैथानी- मांगल संग्रह

गिरिधारी प्रसाद कंकाल- मौल्यार गीत, विनयनगर, नई दिल्ली, सन् 1963, पृष्ठ 48; सूना बैण गढ़वाल साहित्य मण्डल, नई दिल्ली,  सन् 1960, पृष्ठ 28; फुर घेंदुड़ी कविता, सन् 1959, पृष्ठ 16; नवांण (गीत) विनय नगर, नई दिल्ली, सन् 1956, पृष्ठ 32.

गिरीश सुन्दरियाल- अन्वार (कविता) हिमालय लोक साहित्य एवं संस्कृति विकास ट्रस्ट देहरादून सन् 2006 पृ० 88; मौळ्यार (गीत), हिमालय लोेक साहित्य एवं संस्कृति विकास ट्रस्ट, देहरादून, सन् 2008, पृष्ठ 62; असगार (नाटक), समय साक्ष्य, देहरादून, 2010, पृ. 200; कब खुललि रात (नाटक), ह्वळी स्वाँ (गीति काव्य), उड़ि जौं अगास (गीत), समय साक्ष्य, देहरादून; कुटमुणी (बाल कविता), समय साक्ष्य, देहरादून, 2018, पृ. 86; अंग्वाळ सौ सालै कविता, (संयुक्त संपादन) हिमालय लोक साहित्य एवं संस्कृति विकास ट्रस्ट, देहरादून, 2012, पृ. 350; हुंगरा 100 सालै कथा जात्रा (संयुक्त संपादन), समय साक्ष्य, देहरादून, 2015, पृ. 484

गीतेश सिंह नेगी- घुर घुघुती घुर (कविता), धाद प्रकाशन, देहरादून, 2017, पृ. 82

गुणानंद जुयाल- मध्य पहाड़ी भाषा का अनुशीलन और उसका हिंदी से सम्बन्ध, नवयुग ग्रन्थागार, लखनऊ, 1967, पृ. 196

गुणानंद पथिक- गितांग कविता संग्रह, नेहरू कॉलोनी, देहरादून, सन् 1983, पृष्ठ 41; रामू-रामी; विगुल गीत, स्वयं प्रकाशित, सन् 1962, पृष्ठ 24

गोकुलानंद किमोठी- पितरु को रैबार कविताएं, नवभारत प्रकाशन मंदिर, सहारनपुर, सन् 1979, पृष्ठ 42; डांड्यूं कु रैबार कविता संग्रह, विनसर पब्लिशिंग कं., देहरादून, सन् 2006, पृष्ठ 80; गढ़वाल गाथा, ग्रामीण का दोहा (कविता)

गोपाल दत्त मिश्र ‘बंगथल’- श्रीमद्भगवतगीता, स्वयं प्रकाशित, 2015, पृ. 144

गोपेश्वर कोठियाल (संपादन)- गढ़वाली का निबंध, गढ़वाली जन साहित्य परिषद, देहरादून, सन् 1957, पृष्ठ 62

डॉ० गोविन्द चातक- छुमा (गीत), जुगलकिशोर एण्ड सन्स, देहरादून,  सन् 1955, पृष्ठ 34; गढ़वाल के लोकगीत लोकगीत संग्रह, जुगलकिशोर एण्ड ब्रदर्स, देहरादून सन् 1954, पृष्ठ 436; गढ़वाली लोकगाथाएँ, मोहनी प्रकाशन, देहरादून सन् 1958, पृष्ठ 238; गढ़वाली भाषा व्याकरण, लोक भारती प्रकाशन, देहरादून, सन् 1959, पृष्ठ 144; बांसुली गीत, जुगलकिशोर एण्ड ब्रदर्स, देहरादून, सन् 1955, पृष्ठ 48; बाजूबंद (गीत); धरती का फूल; क्या गोरी क्या सौंळी (निबंध) , श्याम बुक डिपो, देहरादून, सन् 1956, पृ. 50; रंत-रैबार (गीत), श्याम बुक डिपो, देहरादून, सन् 1963, पृष्ठ 96; खुदेड़ गीत, प्यारी छुमा, मांगल गीत, जंगली फूल, गीत बांसती, फूलपाती, गढ़वाल की लोककथाएँ; मध्य पहाड़ी की भाषिक परंपरा और हिंदी  व्याकरण, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, सन् 2000, पृष्ठ 188

गोविन्दराम शास्त्री- गढ़शतकम् काव्य, बृजमोहन थपलियाल, पोखरी, चमोली, 2005, पृ. 28; रामू की बदरी-केदार यात्रा

घनश्याम रतूड़ी ‘सैलानी’- चौला बदल, गंगा का मैत बिटि कविता, सर्वाेदय कुटी, गंगोरी, सन् 1988, पृ. 116

चक्रधर बहुगुणा- नौबत (कविता) , स्वयं प्रकाशित, सन् 1953, पृष्ठ 52; मोछंग (कविता) , बदरीकेदारेश्वर प्रेस, पौड़ी, सन् 1938, पृष्ठ 58; गढ़वाली भाषा की दन्त कथाएँ, माडर्न आर्ट प्रेस, देहरादून,  सन् 1981, पृष्ठ 40.

चन्द्र दत्त सुयाल- समळौण्या रैगि टीरि (कविता), समय साक्ष्य, देहरादून, सन् 2015, पृ. 112

चन्द्रशेखर आजाद- गढ़वाली हिंदी कहावत कोश, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, सन् 1977, पृ. 222

चन्द्र सिंह राही- दिल का उमाळ; रमछोळ; गीत गंगा

चारुचन्द्र चन्दोला- बिन्सरि, कविता, साहित्या चन्दोला, देहरादून, 2014, पृ. 90

चिन्मय सायर- तिमला फूल कविता, सन् 1997; मन अघोरी कविता, बिजनौर, सन् 2005, पृष्ठ 96; औनार, कविता, अविचल प्रकाशन, बिजनौर, सन् 2010, पृष्ठ 64.

जगदम्बा चमोला- गाजी डॉट कॉम कविता, विनसर पब्लिशिंग कंपनी, देहरादून, खुसुर-पुफसुर, कविता, संस्कृति प्रकाशन, अगस्त्यमुनि, 2020, पृ. 200

डॉ० जगदम्बा प्रसाद कोटनाला- मौळ्यार आलु हि त् कविता, गढ़वाली प्रकाशन, देहरादून, 2014, पृ. 70; गढ़वाली काव्य उद्भव, विकास एवं वैशिष्ट्य, गढ़वाली प्रकाशन, देहरादून, 2011, पृ. 468

जगदीश पोखरियाल- नाचि नरसिंग (नाटक) , श्रीनगर, गढ़वाल,  सन् 1973, पृ. 50.

जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी- किसराण (कविता), समय साक्ष्य, देहरादून, 2010, पृ. 54

जगदीश बहुगुणा ‘किरण’- घाम (कविता)

जगमोहन सिंह जयाड़ा ‘जिज्ञासू’- अठ्ठैस बसंत काव्य, रंकबंधु साहित्य अकादमी, फरीदाबाद, 2017, पृ. 75

जगमोहन सिंह बिष्ट- कर्च-कबर्च, गजल, शब्द संस्कृति 

प्रकाशन, देहरादून, 2014, पृ. 80; अपणा अपणा रूपकुण्ड कविता

जगमोहन सिंह रावत- फाग्णै फिक्वळी ( गीति काव्य), रावत डिजिटल, गाजियाबाद, 2019, पृ. 150; चैतै चैत्वाळि (कविता), रावत डिजिटल, गाजियाबाद, 2020, पृ. 96

जग्गू नौडियाल- गीतू की गाड (गीत), स्वयं प्रकाशित, 1963, पृ.30; समलौण कविताएं, समळौण प्रकाशन, पौड़ी, सन् 1980, पृष्ठ 124

जनार्दन प्रसाद काला- गढ़वाली भाषा और उसका साहित्य, समय साक्ष्य, देहरादून, 2012, पृ. 474

जय लाल वर्मा- बेताल पच्चीसी; गढ़वाली भाषा का शब्दकोश, कालेश्वर प्रेस, कोटद्वार, सन् 1982, पृष्ठ 237.

जयवर्धन काण्डपाल- नौं नाज (कविता/गजल), संस्कृति प्रकाशन, अगस्त्यमुनि, 2014, पृ. 48 ; रणसूर कथा, (खण्ड काव्य)

जयानंद कुकसाल- इलमत्तु दादा, कविता, अरुणोदय प्रकाशन, दिल्ली, सन् 1988, पृ.48

जीत सिंह नेगी- भारी भूल (नाटक), गीत गंगा, जौंल मंगरी गीत, जुगलकिशोर, देहरादून, सन् 1914, पृष्ठ 26., म्यारा गीत, संस्कृति विभाग, उत्तराखण्ड, देहरादून, 2011, पृ. 88

जीवंती देवी- रुम्कि दौ कविता, सेमवाल प्रिंटिंग प्रेस, ऋषिकेश, 2018, पृ. 80

जीवानंद श्रीयाल- गढ़ साहित्य सोपान; मुण्ड निखोळू (कविता),  (संपादक-चक्रपाणी श्रीयाल) विनसर पब्लिशिंग कंपनी, देहरादून, सन् 2005, पृष्ठ 151

डी पी बमराड़ा- ब्वै कहानी, संस्कृति विभाग, देहरादून, 2015, पृ. 66

तारा दत्त गैरोला- सदेई कविता, वीरगाथा प्रकाशन, दोगड्डा, संवत् 1921, पृ. 56; गढ़वाली कवितावली

तारा दत्त लखेड़ा- विरहणि बाला (गीत); सत्य प्रेम; मां 1997

तेजपाल सिंह- गढ़वाली गीतों की माला

तोताकृष्ण गैरोला- प्रेमी पथिक (1932)

तोताराम ढौंडियाल ‘जिज्ञासु’- ग्वै (कविता), धाद प्रकाशन, देहरादून, सन् 2007, पृष्ठ 77; गढ़वाली मांगळ (मांगळ गीत), धाद प्रकाशन, देहरादून, सन् 2009, पृष्ठ 68; गढ़वळि गीत संग्र धाद प्रकाशन, देहरादून, 2012, पृ. 92; हमरो हक (कविता), धाद प्रकाशन, देहरादून,2010, पृ. 158

दयाधर प्रसाद बमराड़ा- ब्योलि जागर प्रकाशन, नई दिल्ली, सन् 1988, पृ. 150

दर्शन सिंह बिष्ट- केर (कविता), धाद प्रकाशन, देहरादून, सन् 2008; काफल

दर्शन सिंह रावत- उत्तराखण्डी लाल छौं मी कविता

दिनेश ध्यानी- गंगा जी का जौ छन भैजी 2011 (कविता), न्यूतेर (कहानी), नेक्सट इरा, दिल्ली, 2012, पृ. 101; बीरा बैण (लोक कथा) गढ़वाल अध्ययन प्रतिष्ठान, दिल्ली, 2013; धार वोर धार पोर (कविता), समय साक्ष्य, देहरादून, 2019 पृ. 124

दीनदयाल सुन्दरियाल ‘शैलज’- बिसिर्याँ बाटा बिरड़्याँ मनिखि (कविता), समय साक्ष्य, देहरादून, 2015, पृ. 84

दुर्गा प्रसाद घिल्डियाल- म्वारि (कहानी संग्रह), गढ़वाल अध्ययन प्रतिष्ठान, देहरादून, सन् 1986, पृष्ठ 111; ब्वारी;  गारि, (कहानी संग्रह), रामकृष्णपुरम, नई दिल्ली, सन् 1981, पृष्ठ 115; उच्याणो (उपन्यास), सूर्य प्रकाशन, दिल्ली, सन् 1990, पृष्ठ 154.

देवेन्द्र जोशी- कांठ्यों मा औण से पैली (कविता), चिट्ठी प्रकाशन, देहरादून, सन् 1994, पृष्ठ 64; जलड़ा रै जंदन (कविता), विनसर पब्लिशिंग कंपनी, देहरादून, 2019, पृ. 116

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भवानी दत्त थपलियाल- जयविजय (नाटक), 1911; प्रह्लाद नाटक, 1930; बाबा की कपाल क्रिया; फौंदार जी की कछड़ी नाटक, वीरगाथा प्रकाशन, दोगड्डा, सन् 1930, पृष्ठ 36., कलजुग्या नंद की पाठशाला नाटक, वीरगाथा प्रकाशन, दोगड्डा, पृ. 40

भवानी दत्त धस्माना एवं ब्रह्मानंद थपलियाल- ढोलसागर संग्रह

भीमराज सिंह कठैत- शेरू

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मदनमोहन डुकलाण- आंदि जांदि सांस (कविता), समय साक्ष्य देहरादून सन् 2001 पृ.64; ग्वथनी गौं बिटि (संपादित), कविता संग्रह, हिमालय लोक साहित्य एवं संस्कृति ट्रस्ट, देहरादून, सन् 2002, पृष्ठ 84; अपणो ऐना अपणी अंद्वार (कविता) समय साक्ष्य, देहरादून, 2017, पृ. 82; अंग्वाळ सौ सालै कविता, (संयुक्त संपादन) हिमालय लोक साहित्य एवं संस्कृति विकास ट्रस्ट, देहरादून, 2012, पृ. 350; हुंगरा 100 सालै कथा जात्रा (संयुक्त संपादन), समय साक्ष्य, देहरादून, 2015, पृ. 484

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महावीर व्यासुड़ी- गढ़वाली भाषा किलै

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महेश तिवाड़ी- बेदी मा का बचन (गीत)

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मित्रानंद शर्मा- वीर बालक अभिमन्यु

मुकुंदराम किमोठी- ताजिके भास्कर

मुकुंदराम कुकरेती- मेरु दंदोल

मुरली दीवान- फुल संगरांद काव्य, स्वयं प्रकाशित, 2010

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वसुंधरा डोभाल- सुमनांजली

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विनोद भट्ट- ब्योलि

विमल साहित्य रत्न- वीर बाला तीलू रौतेली (महाकाव्य)

डॉ० वीरेन्द्र सिंह बर्त्वाल- गढ़वाली गाथाओं में लोक और देवता, (विश्लेषण) , विनसर पब्लिशिंग कंपनी, देहरादून, 2014, पृ. 320; गढ़वाली भाषाः प्रकृति और समृद्धि, (विवेचना) , विनसर पब्लिशिंग कंपनी, देहरादून, 2016, पृ. 156

विशालमणि शर्मा- गांधी बिठोबा (नाटक), वीर सैनिक गढ़वाल 1945, श्रीकृष्ण (नाटक)

विश्वम्भर दत्त उनियाल- बसंती

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विश्राम सिंह अधिकारी- जमाना को रंग कविता

वीणापाणि जोशी- पिठैं पैरालो बुरांस कविता, केशव प्रकाशन, देहरादून, सन् 2003, पृष्ठ 142

वीरेन्द्र जुयाल ‘उपरि’- खैंचाताणि (कविता), रावत डिजिटल, गाजियाबाद, सन् 2019, पृ. 120

वीरेन्द्र पंवार- इनमा कनक्वे आण बसन्त (कविता) धाद प्रकाशन, देहरादून, सन् 2004, पृ.  96; बीं (समीक्षा), धाद प्रकाशन, देहरादून, 2012, पृ. 140; छ्वीं बथ  (साक्षात्कार), विनसर पब्लिशिंग कंपनी, देहरादून, 2013 पृ. 166; गीत गौं का (गीत) विनसर हिमालय न्यास, देहरादून, 2014, पृ. 92

शशि शेखरानंद सकलानी- पुष्पांजलि मोहन सदन, देहरादून, सन् 1949, पृष्ठ 53

शांति प्रकाश ‘जिज्ञासु’- आस (कविता) धाद प्रकाशन, देहरादून सन् 2010 पृ. 88; एक दबाल (कविता), धाद प्रकाशन, देहरादून, 2012, पृ. 120; धाद (संपादन), कविता, धाद प्रकाशन, देहरादून, 2010, पृ. 112; सग्वाडि़ (प्रबन्ध काव्य), धाद प्रकाशन, देहरादून, 2019, पृ. 96; उत्तराखण्ड लोक भाषाओं के सृजनरत् रचनाकार धाद प्रकाशन, देहरादून सन् 2017, पृ. 224; गढ़वाळि मांगळ संग्रह, समय साक्ष्य, देहरादून, 2019, पृ. 112

शालीग्राम वैष्णव- गढ़वाली पखाणा, गढ़वाली कहावतें, नंदप्रयाग, चमोली, सन् 1930, पृष्ठ 193

शिवदयाल ‘शैलज’- छोया नि सूखा (कविता) धाद प्रकाशन, देहरादून, 2017

शिवनारायण सिंह बिष्ट- गढ़ सुम्याल (कविता), 1926

शिव प्रसाद डबराल ‘चारण’ (संपादक)- सूरिज नाग भड़ वार्ता, वीरगाथा प्रकाशन, दोगड्डा, पृ. 32

शिवराज सिंह रावत ‘निसंग’- भाषा तत्व और आर्य भाषा का विकास-  विनसर पब्लिशिंग कं., सन् 2010, पृष्ठ 272

शिवानंद नौटियाल- श्याम छम घुंघुरू बजला, वण का फूल (एकांकी), सेलिया आग; गढ़वाल के लोकनृत्य गीत  हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग,  सन् 1981, पृष्ठ 468.

शिवानन्द पाण्डे ‘प्रमेश’- उज्याळी, गीत, माधुरी प्रकाशन, दिल्ली, सन् 1962, पृष्ठ 47; चन्द्रवदनी चालीसा

शिव प्रसाद कैशिव- महाभारत का हीन नाटक

शूरवीर सिंह रावत- विवेकानंदः देशवासियों तैं वूंको संदेश, समय साक्ष्य, देहरादून, 2016, पृ. 80

शेर सिंह गढ़देशी- रंगदोळ कविता, डोईवाला, देहरादून, सन् 2001, पृष्ठ 134

श्यामा देवी- रमा सन् 1927.

श्रीधरा नंद- वृत्त माला

श्रीधर जमलोकी- उत्तर रामचरित; दुन्दुभि डिम-डिम, विशाल कार्यालय, नारायणकोटि, सन् 1964, पृष्ठ 95; एक बिसी, 1953; रोन्देड़ू; अश्रुधारा, 1953; गढ़ दुर्दशा (काव्य)

डॉ० श्रीविलास बुड़ाकोटी ‘शिखर’- कुब्जा परि किरपा, श्रीकांत प्रकाशन, कोटद्वार, 2018, पृ. 20

संजय किशन ध्यानी- अंग्वाळ (कविता), स्वयं प्रकाशित, 2016, पृ. 42; तू दैणी ह्वे जैई (भजन), शिवा फिल्म्स, देहरादून, 2013, पृ. 35

संजय नेगी ‘सजल’- धै लगाणी डांडी-कांठी (कविता) संस्कृति प्रकाशन, अगस्त्यमुनि

संदीप रावत- एक लपाग (कविता), समय साक्ष्य, देहरादून, 2013, पृ. 80; गढ़वाळि भाषा अर साहित्य की विकास जात्रा, विनसर पब्लिशिंग कंपनी, देहरादून, 2014, पृ. 192; उदरोळ 2016 कहानी, उत्कर्ष प्रकाशन, मेरठ, 2016, पृ. 86; लोक का बाना गद्य लेख, समय साक्ष्य, देहरादून, 2016, पृ. 118; तू हिटदि जा गीत, रावत डिजिटल, 2020

सच्चिदानंद काण्डपाल- रैबार (कविता)

डॉ० सतीश कालेश्वरी- सुण्दा रावा (कविता), लकीर इंडिया, गाजियाबाद, 2017, पृ. 114

सतीस बलोदी- औ निंदी बाळी (कविता)

सत्य प्रसाद रतूड़ी, देवीदत्त नौटियाल, विद्यालाल पुंडीर, मेधाकर नौटियाल-  पांखु नाटक, वीरगाथा प्रकाशन, दोगड्डा सन् 1932, पृष्ठ 40

सत्य शरण रतूड़ी- उठा गढ़वालियो (कविता), वीरगाथा प्रकाशन, दोगड्डा, पृ. 32

डॉ० सत्यानंद बडोनी- ताता दूधै घूट (गीत/कविता), विनसर पब्लिशिंग कंपनी, देहरादून, 2013, पृ. 120; इथगि चैन्दू (कहानी), समय साक्ष्य, देहरादून, 2017, पृ. 120

सदानंद जखमोला ‘संतत’- रैबार खण्डकाव्य, चण्डीशिला, दुगड्डा, सन् 1951, पृष्ठ 22; महाकवि कालीदास

सर्वेश्वर दत्त काण्डपाल- समौण अर बुझौण गीत, गौचर, सन् 1971, पृ. 40

सिद्धीलाल ‘विद्यार्थी’- रगड़्वात कविता, समय साक्ष्य, देहरादून, 2017, पृ. 116

सुदामा प्रसाद प्रेमी- गैत्री की ब्वे कहानी, गढ़भारती, दिल्ली, सन् 1985 पृ. 80; बट्वे कविता, प्रेमी प्रकाशन मंदिर, कल्जीखाल, पौड़ी, सन् 1964, पृष्ठ 22; अग्याल (कविता) गढ़वाल नवचेतना समिति, दिल्ली, सन् 1971, पृ.32; द्वी आंसू (कविता); घंघतोळ कविता, सन् 1997

सुधीर बर्त्वाल- आणा भ्वींणा, संस्कृति प्रकाशन, अगस्त्यमुनि, 2013, पृ. 96

सुमित्रा जुगलान- गढ़वाळि आणा, बुलाक (किस्सा), धाद प्रकाशन, 2017

सुरेन्द्र खुसहाल- पसीन की खुशबू (कविता), अन्दरसौं-डाबरी, रिखणीखाल,  सन् 1989, पृष्ठ 30

सुरेन्द्र दत्त सेमल्टी- खड़ु उठा धौं लठ्याळौ (कविता), मीडिया प्लस, देहरादून, 2014, पृ. 108

सुरेन्द्रपाल- चुंगटी (कविता), धाद प्रकाशन, देहरादून, 2000, पुनर्मुद्रण 2009, पृ. 53; जाळ (गद्य)

सुरेन्द्र भट्ट ‘एकांत’- सतमंगल़्या (उपन्यास) , विनसर पब्लिशिंग कंपनी, देहरादून, 2015, पृ. 120

डॉ० सुरेश चन्द्र पोखरियाल- गढ़वाली एवं कुमाउनी भाषाओं की भाषा वैज्ञानिक संरचना शोध प्रबन्ध, विनसर पब्लिशिंग कंपनी, देहरादून, 2019, पृ. 340

डॉ सुरेश ममगांई- गढ़वाली भाषा और व्याकरण  विनसर पब्लिशिंग कंपनी, देहरादून, 2019, पृ. 186

सुरेश स्नेही- विराणि छ्वीयूं मा (कविता), समय साक्ष्य, देहरादून, 2015, पृ. 80; मनख्यात कविता, समय साक्ष्य, देहरादून, 2019, पृ. 100

सुलोचना परमार- उकाल उंदार कविता, समय-साक्ष्य, देहरादून, सन् 1999,    पृष्ठ 58; धार मकै जून, अमित सिंह, (कविता) , 2008, पृ. 62

हरिदत्त देवरानी (संपादक)- वसुधारा गढ़वाल साहित्य परिषद, प्रयाग, सन् 1946, पृष्ठ 220

हरिदत्त भट्ट ‘शैलेश’- गढ़वाली भाषा और उसका साहित्य  हिन्दी समिति, उ.प्र., लखनऊ, सन् 1976, पृष्ठ 426; नौबत नाटक, विनसर पब्लिशिंग कं., देहरादून, सन् 2008, पृष्ठ 64.; हरी दूब

हरीश घिल्डियाल- अंज्वाळ, काळि रात अर अमर ज्योति

हरीश जुयाल ‘कुटज’- उकताट, (कविता) , धाद प्रकाशन, देहरादून, सन् 2001, पृ.88; खिगताट (कविता संग्रह), समय साक्ष्य, देहरादून, सन् 2004, पृष्ठ 64; खुबसाट (व्यंग्य), समय साक्ष्य, देहरादून, 2012; भैजि की बरात, (कविता), समय साक्ष्य, देहरादून, 2016, पृ. 120

हरीश बडोला- पस्यो को रंग (कविता), समय साक्ष्य, देहरादून, 2015, पृ. 174

हर्षपति डोबरियाल- पतिव्रता

हर्ष पर्वतीय- गैंणी का नौं पर (उपन्यास), समय-साक्ष्य, देहरादून, सन् 2004, पृष्ठ 48., उज्याळो, (उपन्यास), समय-साक्ष्य, देहरादून, सन् 2006, पृ. 72; तब अर अब (कविता) , समय साक्ष्य, 2018 पृ. 92

हेमवती नंदन भट्ट ‘हेमू’- उंद बगदी गंगा (कविता), समय साक्ष्य, देहरादून 2010, पृ. 96

संकलन-  रमाकान्त बेंजवाल

(साभार- गढ़वाल हिमालय- रमाकान्त बेंजवाल, तृतीय संस्करण, 2021)

गढ़वाली भाषा के शब्दकोश



स्वतंत्रता से पूर्व गढ़वाली भाषा के शब्द संग्रह पर गढ़वाल के पहले प्रकाशक विशालमणि शर्मा जी और उसके साथ ही  गढ़वाली साहित्य परिषद, लाहौर के विशेष सदस्य पं० बलदेव प्रसाद नौटियाल जी ने विचार किया। शर्मा जी ने गढ़वाली के कुछ शब्दों का संग्रह भी किया था। बलदेव प्रसाद नौटियाल जी ने एक शब्दाकोश निर्माण समिति का गठन किया था, जिसके संयोजक पं० श्रीधरानंद घिल्डियाल एवं पं० शिव प्रसाद घिल्डियाल जी बनाए गए। लाहौर के बाहर से भी चक्रधर बहुगुणा जी, भगवती प्रसाद पांथरी जी, महंत योगेन्द्र पुरी जी, पं० श्रीधरानंद नैथानी जी, भक्त दर्शन जी आदि विभूतियाँ इस समिति में सम्मिलित की गई थीं। नमूने के तौर पर इस शब्दकोश के कुछ पन्ने प्रकाशित भी हुए। देश की आजादी के बाद पाकिस्तान अलग देश बन गया। समिति द्वारा जितना भी गढ़वाली शब्दों का संग्रह किया गया था इस राजनैतिक घटनाक्रम के कारण वह शब्दकोश का रूप नहीं ले पाया। ये संकलित शब्द किसके पास हैं, यह भी जानकारी नहीं है।

गढ़वाली का पहला शब्दकोश मास्टर जयलाल वर्मा जी द्वारा वर्ष 1982 में प्रकाशित किया गया। इसकी पांच सौ प्रतियाँ छपीं। इसका दूसरा संस्करण कुंवर सिंह नेगी ‘कर्मठ’ जी द्वारा 1992 में प्रकाशित किया गया। 168 पृष्ठों के इस कोश में लगभग पांच हजार शब्द संकलित हैं। मूल प्रविष्टि गढ़वाली में है। उसके बाद व्याकरणिक कोटि और फिर शब्द का अर्थ दिया गया है। दूसरा गढ़वाली शब्दकोश मालचंद रमोला जी द्वारा सन् 1994 में श्रद्धम, पौड़ी द्वारा प्रकाशित किया गया। 228 पृष्ठों के इस शब्दकोश में भी लगभग पांच हजार शब्द संगृहीत हैं। इस शब्दकोश में गढ़वाली शब्दावली राजभाषा के नजदीक है। उमाशंकर सतीस जी ने भी जौनसारी शब्दों के उच्चारण पर कार्य किया है, जिसे लाल बहादुर शास्त्री अकादमी, मसूरी ने तैयार करवाया था। 

तीसरा गढ़वाली हिंदी शब्दकोश वर्ष 2007 में अरविंद पुरोहित जी एवं बीना बेंजवाल जी द्वारा प्रकाशित किया गया, जिसका संपादन रमाकान्त बेंजवाल ने किया। इसकी भूमिका डॉ० गोविंद चातक जी द्वारा लिखी गई है। इसका द्वितीय संस्करण सन् 2013 में प्रकाशित हुआ। 520 पृष्ठों के इस शब्दकोश में लगभग 21 हजार शब्द संकलित हैं। मूल प्रविष्टि गढ़वाली में दी गई है और उसके बाद कोष्ठक में व्याकरणिक कोटि, कुछ शब्दों का स्रोत तथा फिर शब्दार्थ दिया गया है। कतिपय शब्दों के समानार्थी, विलोम तथा कहीं-कहीं शब्दों की व्याख्या में कोई पदबंध या छोटा-सा वाक्य दिया गया है जिससे शब्द का प्रयोग अधिक स्पष्ट हो जाता है। पाठकों की सुविधा के लिए इस शब्दकोश में वर्गीकृत शब्दावली की एक लम्बी सूची दी गई है। प्राकृतिक वनस्पति, वनौषधि, जल, पत्थर, लकड़ी, रिंगाल से संबंधित, लोक परंपराएं, लोक व्यवसाय, लोक विश्वास, मानव स्वभाव, लोक वाद्य, लोक गीत, मकान, बर्तन, पशु एवं कीट, अनाज, सब्जी, फल, वस्त्र, आभूषण, भोजन, पक्षी, कृषि उपकरण, शरीर के अंग, पहर, शारीरिक विकार/बीमारियों से संबंधित शब्द, रिश्ते-नाते, रिश्ते के गाँव, ऋतुएँ/मौसम, तंत्र-मंत्र संबंधी शब्दावली, गाँव के स्थान नाम, रंग, गिनती, दिन, राशि, नक्षत्र, तिथि, महीने, अनुभूति बोधक, ध्वन्यर्थक, गंध बोधक, स्वाद बोधक, स्पर्श बोधक, समूह वाचक, संख्यावाची शब्द, बचपन के खेल-खिलौने, मात्रक आदि वर्गीकृत शब्दावली परिशिष्ट में दी गई है। इनके अतिरिक्त गढ़वाली, जौनसारी एवं भोटिया शब्दों की तुलनात्मक सूची के साथ पर्यायवाची शब्द, विलोम शब्द, शब्द युग्म, अनेकार्थी शब्द, समानता सूचक शब्द, मुहावरे, लोकोक्तियाँ, पहेलियाँ आदि भी संक्षिप्त रूप में दिए गए हैं।

चौथा शब्दकोश अखिल गढ़वाल सभा, देहरादून द्वारा संस्कृति विभाग उत्तराखण्ड के आर्थिक सहयोग से तैयार करवाया गया। वर्ष 2014 में प्रकाशित इस शब्दकोश के प्रधान संपादक डॉ० अचलानंद जखमोला जी एवं प्रबन्ध एवं संयोजक संपादक भगवती प्रसाद नौटियाल जी और सम्पादक मण्डल में शिवराज सिंह रावत ‘निःसंग’ जी, डॉ० आर० एस० असवाल जी, रामकुमार कोटनाला जी हैं। गढ़वाली हिंदी अंग्रेजी के इस पहले त्रिभाषी शब्दकोश में 748 पृष्ठ हैं। मूल प्रविष्टि गढ़वाली में दी गई है। फिर व्याकरणिक कोटि और उसके बाद शब्दों का अर्थ हिंदी तथा अंग्रेजी में दिया गया है। मूल प्रविष्टि में कई शब्दों के औच्चारणिक विभेद एक साथ दिए गए हैं। प्रविष्टि के पहले शब्द को मानक माने जाने की बात कही गई है। संस्कृति विभाग उत्तराखण्ड द्वारा प्रकाशित यह शब्दकोश आम पाठक तक नहीं पहुँच सका। अखिल गढ़वाल सभा, देहरादून द्वारा सन् 2016 में इसे स्वयं प्रकाशित किया। संस्कृति विभाग द्वारा प्रकाशित शब्दकोश की तुलना में टाइप सेटिंग के कारण इसमें पृष्ठ भले ही कम हैं लेकिन कुछ और शब्द जोड़ने से शब्द संख्या बढ़ी है। 640 पृष्ठों के इस संस्करण में एक पृष्ठ में 30 से 35 प्रविष्टियाँ हैं यदि एक पेज की 33 प्रविष्टि भी लगाएँ तो कुल शब्दों की प्रविष्टियों की संख्या 21,120 के आसपास होती है।

हिंदी कुमाउंनी गढ़वाली जौनसारी शब्दकोश वर्ष 2015 में प्रकाशित हुआ। इस कोश की संपादक भारती पाण्डे जी हैं। इस कोश में गढ़वाली के लिए बीना बेंजवाल जी तथा जौनसारी के लिए रतन सिंह जौनसारी जी ने कार्य किया है। 252 पृष्ठों के इस शब्दकोश में मूल प्रविष्टि हिंदी में दी गई है फिर कुमाउंनी, गढ़वाली और जौनसारी भाषा के शब्द क्रमशः दिए गए हैं। परिशिष्ट में वर्गीकृत शब्दावली भी दी गई है। डॉ० अचलानंद जखमोला जी द्वारा इंगलिश गढ़वाली हिंदी डिक्शनरी सन् 2016 में प्रकाशित की गई। 246 पृष्ठों के इस शब्दकोश में लगभग 6-7 हजार शब्द हैं। मूल प्रविष्टि अंग्रेजी भाषा में दी गई है फिर व्याकरणिक कोटि, उसके बाद गढ़वाली और हिंदी में अर्थ दिया गया है।

पीपुल्स लिंग्वेस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा उत्तराखण्ड की 13 भाषाओं का सर्वेक्षण होने के बाद इन भाषाओं का एक व्यावहारिक शब्दकोश ‘झिक्कल काम्ची उडायली’ नाम से प्रकाशित हुआ। 1500 व्यावहारिक शब्दों के इस कोश में मूल प्रविष्टि हिंदी में है उसके बाद कुमाउंनी, गढ़वाली, जाड, जौहारी, जौनपुरी, जौनसारी, थारू, बंगाणी, बोक्साड़ी, मार्च्छा, रं-ल्वू, रवांल्टी फिर राजी के शब्द दिए गए हैं। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा द्वारा भी हिंदी की उपभाषाओं के व्यावहारिक शब्दों का एक शब्दकोश बनाया गया है, जिसमें गढ़वाली और कुमाउनी भी सम्मिलित हैं । 

हिंदी गढ़वाली (रोमन रूप सहित) अंग्रेजी त्रिभाषी कोश रमाकान्त बेंजवाल एवं बीना बेंजवाल द्वारा वर्ष 2018 में प्रकाशित किया गया। 480 पृष्ठों के इस कोश में मूल प्रविष्टि हिंदी में फिर व्याकरणिक कोटि तब गढ़वाली अर्थ, अंग्रेजी अर्थ और गढ़वाली का रोमन रूप भी दिया गया है। लगभग दस हजार शब्दों के इस कोश मेें पूर्व में प्रकाशित गढ़वाली हिंदी शब्दकोश में संकलित वर्गीकृत शब्दावली भी दी गई है। इनके अतिरिक्त कन्हैयालाल डंडरियाल जी द्वारा संकलित शब्दकोश, कुंज बिहारी मुंडेपी जी का ‘तमळि उंद गंगा’ गढ़वाली हिंदी अंग्रेजी शब्दकोश और महेशानंद जी के गढ़वाली हिंदी शब्दकोश निर्माण पर कार्य किया जा रहा है।  

अभी तक शिक्षार्थी कोश पर कार्य हुए हैं। अब मानक शब्दकोश, व्युत्पत्ति कोश तथा आन लाइन मोबाइल एप शब्दकोश पर कार्य करने की आवश्यकता है, जिसके लिए प्रयास जारी हैं। 

- रमाकान्त बेंजवाल

गढ़वाल में यातायात

         उन्नीसवीं सदी तक गढ़वाल क्षेत्र बेहद बीहड़ व अगम्य था। यहाँ के यातायात की शुरुआत पगडंडियों से हुई। धार्मिक ग्रंथों विशेषकर महाभारत मे...