पावन सलिला गंगा का महात्म्य ऋग्वेद (10ः75ः5) एवं (6ः54ःः37) में आता है। शतपथ ब्राह्मण (31ः5ः4ःः11), जैमिनीय ब्राह्मण (3ः183), तैत्तिरीय आरण्यक (2ः10) तथा रामायण में दर्जनों बार और पुराणों में तो गंगा ही गंगा है। महाभारत में गंगा को देवी के रूप में माना गया है। गंगा भारत की सर्वाधिक महत्वपूर्ण नदी है। इसकी कुल लम्बाई 2525 किमी है, जिसमें 2071 किमी भारत में तथा शेष बंग्लादेश में बहती है। गंगा उत्तराखण्ड में 110 किमी, उत्तर प्रदेश में 1450 किमी, बिहार में 445 किमी तथा पश्चिम बंगाल में 520 किमी की दूरी तय करते हुए बंगाल की खाड़ी में मिलती है। गंगा ने अपनी सहायक नदियों के साथ 10 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल के विशाल उपजाऊ मैदान की रचना की है। गंगा की मुख्य शाखा भागीरथी का उद्गम गंगोत्तरी (3140 मी.) से 19 किमी उत्तर की ओर 3892 मीटर की ऊँचाई पर स्थित हिमनद का मुख है, जिसे गोमुख नाम से जाना जाता है। यह हिमनद 25 किमी लम्बा और चार किमी चौड़ा है।
गढ़वाल में गंगा की मुख्य नदी भागीरथी पर टिहरी में विश्व का सबसे ऊँचा बांध बना है। इस बांध की ऊँचाई 261 मीटर है। इससे 2400 मेगावाट विद्युत उत्पादन होता है। इससे पूर्व सिंचाई के लिए हरिद्वार में अंग्रेजों द्वारा सन् 1840 में गंगा पर एक बांध गंगा के पानी को विभाजित कर ऊपरी गंगा नहर में मोड़ने के लिए बनाया गया था। विशिष्ट पर्वों पर पवित्र गंगा में स्नान का विशेष महत्व है। पवित्र गंगा जल को लोग अपने घरों में रखते हैं। मृत्यु के उपरान्त राख विसर्जित करने और पिण्डदान हेतु भी गंगा सनातन धर्मावलम्बियों के लिए अपनी आस्था और विश्वास का प्रतीक है। इसका महत्व पर्यटन पर आधारित आय के कारण भी है। इसके अतिरिक्त पेयजल, कृषि, पर्यटन तथा साहसिक खेलों में गंगा का विशिष्ट महत्व सर्वविदित है।
ये गंगा का महात्म्य ही है कि गढ़वाल में गंगा की सहायक नदियों को ‘गंगाळ’ कहा जाता है। अलकनंदा की प्रमुख शाखा धौली ने विष्णुगंगा से मिलकर ‘विष्णुप्रयाग’ नंदाकिनी से मिलकर ‘नंदप्रयाग’ पिंडर के संगम पर ‘कर्णप्रयाग’ मंदाकिनी से मिलती हुई ‘रुद्रप्रयाग’ तथा भागीरथी के संगम पर ‘देवप्रयाग’ जैसे ‘पंचप्रयागों’ का निर्माण कर इस क्षेत्र को पुण्य भूमि बनाया है। इन पवित्र नदियों से ही गंगा का निर्माण हुआ है। ‘गंगा संस्कृति’ ही आदि हिंदू संस्कृति मानी जाती है। यहाँ गंगा शब्द कभी-कभी जातिवाचक संज्ञा की तरह भी प्रयुक्त होता है। नन्दा के जागरों में एक जगह वर्णन हैः-
नौ धारों की गंगा ह्वोलि, आड़ू नेड़ू ऐगो अब
पंचधारा गंगा माता, होमकुण्डी की जात हुनी।
इसका तात्पर्य है जल की नौ धाराएँ बहती हैं, पंचधारा नजदीक आने को है और होमकुण्ड में जात सम्पन्न होने को है। यहाँ गंगा जलधाराओं के लिए कहा गया है। जो आगे जाकर नंदाकिनी में मिलती है। गढ़वाल का नाम ‘गंगावाल’ होना चाहिए था। गढ़वाल गंगा का उद्गम है, उसका उत्स है, उसका मायका है, यह गढ़वाल की धियाण है, उसकी आस्था है और उसका विश्वास है। गंगा पर गढ़वाली भाषा में कई गीत रचे गए हैं। जिनमें उत्तराखण्ड के गौरव प्रख्यात गीतकार/गायक नरेन्द्र सिंह नेगी जी द्वारा रचित एक गीत बहुत प्रसिद्ध हैः-
गंदळु करियाली तेरु छाळु पाणी गंगा जी
माँ का दूधै लाज बि नि राखि जाणी गंगा जी
इस गीत में नेगी जी ने गंगा के उस निर्मल जल के प्रदूषित होने का दर्द बयाँ किया है जिसके निवारण के लिए ‘नमामि गंगा’ और ‘स्पर्श गंगा’ जैसे अभियान चलाए गए हैं। इस लोक में गंगा का एक और पहलू है जिसका वर्णन गढ़वाली के ही कवि महेश तिवाड़ी जी ने इस तरह किया हैः-
औरों तैं बगै होला, तिन अमरित का धारा
हमारा भाग परै अयां, तेरा ढुंगा-गारा
यह भी एक सच्चाई है कि गंगा तथा इसकी सहायक नदियाँ पानी और उपजाऊ मिट्टी बहाकर ले जाती है और पीछे छूट जाते हैं पत्थर यानी ‘गंगलोड़े’। बावजूद इसके गंगा हमारे लिए ‘धियाण’ है। वह हमारे स्वभाव में है। हमारे लिए पूज्य है। स्तुत्य है। बोली भाषा में है। हम कामना करते हैं कि इसका जल निर्मल रहे। इसी कामना को व्यक्त करती बीना बेंजवाल जी की गंगा पर लिखी पंक्तियाँ इस प्रकार हैंः-
हिमवंत मैत तेरो गंगा तु हमारि धियाण
सागर तलक बढ़ौंदि जांदि तु हिमालै कु मान
माटा पाणी मैत बिटि तु ल्हिजै समौण
हरु-भरु चैपस बसौंदि गंगा कु मैदान।
इन पंक्तियों में हिमालय गंगा का मायका है। गंगा ही है जो वानस्पतिक वैभव सम्पन्न हिमवंत प्रदेश की जड़ी-बूटियों से अमृत तुल्य बनी जलराशि लिए गंगा सागर तक हिमालय का मान-सम्मान बढ़ाती जाती है। यहाँ की स्मृति को संजोए रखने के लिए यहाँ से मिट्टी और पानी बहाकर गंगा के मैदान का निर्माण करती है।
गंगा की महत्ता को देखते हुए 4 नवम्बर, 2008 को इसे राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया। गंगा की सफाई के लिए कई बार पहल की गई। जुलाई 2014 में ‘नमामि गंगा’ नामक परियोजना प्रारम्भ हुई तथा इसके लिए भारत सरकार द्वारा अलग से बजट का प्रावधान किया गया है। इस योजना के अंतर्गत सरकार ने गंगा में कचरा निस्तारित करने वाली 48 औद्योगिक इकाइयों को बंद करने का आदेश दिया। आज लगभग 29 शहर, 70 कस्बे, और हजारों गाँव गंगा तट पर बसे हैं।
(साभार- गढ़वाल हिमालय- रमाकान्त बेंजवाल)
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